अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट | कबीर के दोहे

अटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट । चुंबक बिना निकले नहीं, कोटि पठन को फूट ।। अर्थ: जैसे कि शरीर में वीर की भाल अटक जाती है और…

Continue Readingअटकी भाल शरीर में, तीर रहा है टूट | कबीर के दोहे
Read more about the article प्रेम पर कबीर के दोहे | prem par kabir ke dohe
kabir ke dohe

प्रेम पर कबीर के दोहे | prem par kabir ke dohe

प्रेम पर कबीर के दोहे आगि आंचि सहना सुगम, सुगम खडग की धार नेह निबाहन ऐक रास, महा कठिन ब्यबहार। अर्थ- अग्नि का ताप और तलवार की धार सहना आसान है…

Continue Readingप्रेम पर कबीर के दोहे | prem par kabir ke dohe